मैंने भगवान देखा नहीं,
पर लगता है _
वो है पानी जैसा.
सबकी प्यास बुझाता.
बिना किसी भेद भाव के,
वहां तक भी पहुँच जाता,
जहाँ कोई भी न जाना चाहता.
बीच दरारों में निकल जाता,
अपना रस्ता बनाता
और
दिखता हमें कुदरत बन कर.
इसे भगवान न कहूँ तो क्या कहूँ मैं
क्योंकि इसकी अपनी कोई इच्छा नहीं.
सबकी ख्वाहिशें पूरी करता,
सबसे अलग है दिखता,
लेकिन रहता सबके भीतर.
उसे खाली करना है खुद को,
क्योंकि वो है भरा भरा सा.
वो बनाता है सब को
और
बन जाता है वजूद बन कर
सबके भीतर
मैं यदि खुद की सत्ता पा लूँ
तो शायद मुझे मिल जाये
परम सत्ता
या
भगवान.
उसके लिए मुझे
सिर्फ कर्म करना होगा,
पानी की तरह.
ताकि मिल जाऊँ,
अन्ततः अथाह सागर में ..
Wednesday, 6 May 2020
पानी _ 8
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