अपने मन को विचारों से आज़ाद कर दो.
तुम्हारा दिल बस शांत हो जाये.
जब तुम्हारा शरीर तुम्हें कैद करने को कोशिश करे,
तो ध्यान लगा कर गहरायी में चले जाओ
और
पा लो अपने दिव्य शरीर को,
जो तुम्हें आज़ाद रखेगा.
हर कोई कितना भी अलग क्यों न हो,
एक परम सत्ता का हिस्सा है
और उसे वहीं लौटना है
फिर सब कुछ एक हो जाना है.
यदि इस दिव्य केंद्र को नहीं पहचानोगे,
तो भ्रम और दुखों में भटकते रहोगे.
यदि जान लोगे कहाँ से आये हो,
तो जज्ब कर लोगे सब कुछ भीतर कहीं,
हलके से लोगे सब कुछ
और
बन जाओगे एक ज़िंदा दिल इंसान,
एक नरम दिल बादशाह को तरह,
ज़िन्दगी के रहस्यों को जान पाओगे.
सही अर्थों में ज़िन्दगी के तोहफों को दिल से क़ुबूल करोगे
और
मृत्यु को आलिंगन में लेने के लिए तैयार रहोगे.
जीवन की किताब
Monday, 13 July 2020
दिव्यात्मा_ 16
Thursday, 2 July 2020
साधक_ 15
पुराने साधक
बड़े ध्यानशील और संवेदनशील थे.
उनका ज्ञान अद्भुत और कल्पना से परे था.
उसे वर्णित करना संभव नहीं,
यदि संभव है तो
उनका एहसास करना.
वो इतने सावधान थे,
जैसे किसी बर्फीले तूफ़ान से गुजर रहे हों.
सतर्क इतने
जैसे कोई योद्धा
दुश्मन की भूमि में.
मेहमान जैसे विनम्र,
बर्फ से पिघल कर जैसे पानी.
लकड़ी के लट्ठे सा आकार लिए.
एक घाटी की तरह.
सब कुछ समेट लेने वाले.
पानी से पारदर्शी.
क्या तुम में धीरज है?
इंतजार करने का,
वैसे जैसे पानी में मिटटी बैठ जाती है
और
पानी साफ़ लगता है.
क्या तुम तब तक रोक सकते हो
खुद को,
जब तक सब कुछ खुद से ठीक होने लगे.
साधक पूर्णता की तलाश में नहीं रहते,
कुछ चाहते नहीं, कुछ मांगते नहीं.
बस जीवन को अनुभव करते हैं
और
जो कुछ भी मिलता है,
उसका स्वागत करते हैं.
क्योंकि
उनको विलीन हो जाना है एक दिन
अपने मूल तत्त्व के साथ
जीवन में..
बोधत्व_ 14
जीवन_
देखो तो सब अदृश्य हो जायेगा.
सुनो तो कुछ न सुनाई देगा.
छू लोगे पर पकड़ न पाओगे.
ऊपर से ये चमकता नहीं,
नीचे अँधेरा भी नहीं.
साधारण सा, बिना नाम का.
शुन्य की दुनिया से लोट कर,
सब तरह के आकार को पा लेना.
एक नहीं बनी हुई आकृति जैसा.
नाजुक सी,
कभी न जनम लेने वाली.
इसको पा लो
तो
फिर कुछ शुरू करने की जरुरत नहीं.
इसके पीछे हो लो,
फिर कोई अंत नहीं.
तुम इस कभी जान नहीं पाओगे,
पर इस जैसे तो बन सकते हो.
खुद को बस अच्छे से महसूस करो.
तुम आये किधर से,
इतना समझ लो
यही बोधत्व है
और
ज़िंदगी पाने की तरकीब भी ..
जीवन _ 13
जान लो कि _
सफलता
विफलता से ज्यादा खतरनाक है.
उम्मीद
डर से ज्यादा खोखली है.
चाहे सीढ़ी पर चढ़ो या उतरो,
हिलते रहोगे.
अगर संतुलन चाहते हो तो _
दो पैरों पर खड़े रहो,
कभी नहीं गिरोगे.
उम्मीद और डर
दोनों ही
हमारे
हताश और थके मन से
पैदा होते हैं,
सिर्फ
हमें खुद से अलग करने के लिए.
अगर मन की न सुनोगे
तो ही जीवन का मधुर संगीत सुन पाओगे
खुद पर भरोसा रखो
और
जीवन से वैसे ही प्यार करो
जैसे वो तुमसे करता है
और
तुम्हे वो सब मिल जायेगा,
जो तुमने कभी माँगा नहीं
पर ..
चाहा जरूर था.
दिल _ 12
रंगीनियाँ
कई बार आँखों को अँधा कर देती है.
शोर
कई बार कानों को बहरा कर देता है.
स्वादिष्टता
कई बार स्वाद को ख़राब कर देती है.
आकांक्षाएँ,
बहुत सी हों तो दिल को रुखा कर देती है.
दुनिया में सुनो तुम सब की,
लेकिन करो सिर्फ अंदर की आवाज़ सुन कर.
तुम चीज़ों को बेखौफ आने जाने दो.
भीतर बाहर होने दो, जो हो रहा है.
आसमान की तरह खुलने दो,
अपने हृदय को.
तभी समेट पाओगे सारी क़ायनात.
और भर लोगे
अपनी झोली,
असीमित, अनंत ..
अस्तित्व _ 11
हम पहिये पर
अपना ध्यान लगाते हैं,
लेकिन ये बीच की धुरी है,
जो गाड़ी चलाती है.
हम घड़े की मिट्टी को
आकार देने में लगे रहते हैं
जबकि
उसका खालीपन ही महत्त्व रखता है.
घड़ा जितना खाली, उतना अच्छा.
हम मकान को,
बाहर से सुन्दर बनाने में लगे रहते हैं
लेकिन ये अंदर की जगह है
जहाँ रहना होता है हमें.
हम अपने अस्तित्व की चिंता करते हैं
जबकि
हम एक परम सत्ता का
हिस्सा भर हैं .
खुद से कुछ भी नहीं
और
जा मिलना है,
अपने वजूद के साथ
उसमें वापिस
जैसे नदी मिल जाती है
अथाह सागर में ..
Thursday, 7 May 2020
सेवा _ 10
क्या तुम मन को भटकने से रोक सकते हो
और
उसको सहज और स्थिर बना सकते हो.
क्या तुम अपने शरीर को बना सकते हो,
नवजात शिशु की तरह लचीला.
क्या तुम अपनी अंतर्दृष्टि को
इतना साफ़ बना सकते हो कि
तुम दिव्य प्रकाश को देख सको.
क्या तुम अपनी मर्जी थोपे बिना
लोगों से प्यार कर सकते हो,
उनका मार्गदर्शन कर सकते हो.
क्या तुम घटनाओं को बिना प्रभावित किये
दुष्कर कार्य सिद्ध कर सकते हो
क्या तुम अपने मन की मदद लिए बिना
सब कुछ समझ सकते हो,
सरलता से, उन्ही भावनाओं के साथ.
बिना कोई हक़ जताये _
जनम देना और पालन पोषण करना.
बिना फल की इच्छा किये _
कर्म करना.
बिना नियंत्रित किये _
दिशा प्रदान करना
यही निष्काम सेवा है
और
मुक्ति का मार्ग भी ..
Wednesday, 6 May 2020
शांति _ 9
जीवन इस तरह न जियो कि _
रोज़ मरना पड़े.
इतना पानी न भरो कि _
बाहर निकलने लगे.
इतने ज्यादा नोकीले न बनो कि _
नोक ही टूट जाये.
धन और सुरक्षा के पीछे इतना मत भागो कि _
दिल का चैन ही ख़त्म कर बैठो.
लोगों का इतना ख्याल मत रखो कि _
उनके गुलाम बन जाओ.
अपना काम करते रहो लेकिन,
श्रेय मत लो.
यही शांति का मार्ग है
और
उस आनंद का भी
जिसके लिए तुम्हे ये जीवन मिला है ..
पानी _ 8
मैंने भगवान देखा नहीं,
पर लगता है _
वो है पानी जैसा.
सबकी प्यास बुझाता.
बिना किसी भेद भाव के,
वहां तक भी पहुँच जाता,
जहाँ कोई भी न जाना चाहता.
बीच दरारों में निकल जाता,
अपना रस्ता बनाता
और
दिखता हमें कुदरत बन कर.
इसे भगवान न कहूँ तो क्या कहूँ मैं
क्योंकि इसकी अपनी कोई इच्छा नहीं.
सबकी ख्वाहिशें पूरी करता,
सबसे अलग है दिखता,
लेकिन रहता सबके भीतर.
उसे खाली करना है खुद को,
क्योंकि वो है भरा भरा सा.
वो बनाता है सब को
और
बन जाता है वजूद बन कर
सबके भीतर
मैं यदि खुद की सत्ता पा लूँ
तो शायद मुझे मिल जाये
परम सत्ता
या
भगवान.
उसके लिए मुझे
सिर्फ कर्म करना होगा,
पानी की तरह.
ताकि मिल जाऊँ,
अन्ततः अथाह सागर में ..
खोज _ 7
ज़िन्दगी है
असीमित,अनंत.
इसका अंत इसलिए संभव नहीं,
क्योंकि ये कभी आरम्भ ही नहीं हुई.
कुछ न भी अच्छा लगे तो भी संतुष्ट.
इसीलिए इसका नाम ज़िन्दगी है,
जीवन से भरपूर.
रहो तो जमीन पर,
ताकि गिरने का भय न हो.
सोच को साधारण कर लो.
संघर्ष को सहजता से लो.
उदार बनो.
जीत हार से न घबराओ.
नेतृत्व करो तो _
नियंत्रित करने की चेष्टा न करो.
काम कोई भी हो उसमें डूब जाओ.
परिवार में मौजूद रहो हरदम.
जब तुम खुद पर
भरोसा करना सीख जाओगे
और
किसी भी दौड़ से अलग कर लोगे
अपने आप को
तो हर कोई देगा तुम्हें समर्थन
और
पा लोगे
वो सब कुछ
जिसकी खोज में हो ..
माँ _ 6
ज़िन्दगी कितनी महान है,
बिलकुल माँ जैसी.
खाली, पर भरी भरी सी.
कभी न ख़त्म होने का अहसास देती.
हर किसी को पैदा करती,
देखभाल करती अच्छे से
और हाँ _
ये तुम में हर वक्त है मौजूद.
जब चाहो इसे बुला लो.
इससे खेलो मत,
इसके साथ खेलो.
थक जाओ तो
बैठ जाओ इसकी गोद में
और आराम कर लो.
शायद फिर
कभी न थक पाओगे ..
दिव्यात्मा_ 16
अपने मन को विचारों से आज़ाद कर दो. तुम्हारा दिल बस शांत हो जाये. जब तुम्हारा शरीर तुम्हें कैद करने को कोशिश करे, तो ध्यान लगा कर गहरायी म...
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जीवन_ देखो तो सब अदृश्य हो जायेगा. सुनो तो कुछ न सुनाई देगा. छू लोगे पर पकड़ न पाओगे. ऊपर से ये चमकता नहीं, नीचे अँधेरा भी नहीं. साधारण...
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हम पहिये पर अपना ध्यान लगाते हैं, लेकिन ये बीच की धुरी है, जो गाड़ी चलाती है. हम घड़े की मिट्टी को आकार देने में लगे रहते हैं जबकि उसका...