Monday, 13 July 2020

दिव्यात्मा_ 16

अपने मन को विचारों से आज़ाद कर दो.
तुम्हारा दिल बस शांत हो जाये.
जब तुम्हारा शरीर तुम्हें कैद करने को कोशिश करे,
तो ध्यान लगा कर गहरायी में चले जाओ
और
पा लो अपने दिव्य शरीर को,
जो तुम्हें आज़ाद रखेगा.
हर कोई कितना भी अलग क्यों न हो,
एक परम सत्ता का हिस्सा है
और उसे वहीं लौटना है
फिर सब कुछ एक हो जाना है.
यदि इस दिव्य केंद्र को नहीं पहचानोगे,
तो भ्रम और दुखों में भटकते रहोगे.
यदि जान लोगे कहाँ से आये हो,
तो जज्ब कर लोगे सब कुछ भीतर कहीं,
हलके से लोगे सब कुछ
और
बन जाओगे एक ज़िंदा दिल इंसान,
एक नरम दिल बादशाह को तरह,
ज़िन्दगी के रहस्यों को जान पाओगे.
सही अर्थों में ज़िन्दगी के तोहफों को दिल से क़ुबूल करोगे
और
मृत्यु को आलिंगन में लेने के लिए तैयार रहोगे.

Thursday, 2 July 2020

साधक_ 15

पुराने साधक
बड़े ध्यानशील और संवेदनशील थे.
उनका ज्ञान अद्भुत और कल्पना से परे था.
उसे वर्णित करना संभव नहीं,
यदि संभव है तो
उनका एहसास करना.
वो इतने सावधान थे,
जैसे किसी बर्फीले तूफ़ान से गुजर रहे हों.
सतर्क इतने
जैसे कोई योद्धा
दुश्मन की भूमि में.
मेहमान जैसे विनम्र,
बर्फ से पिघल कर जैसे पानी.
लकड़ी के लट्ठे सा आकार लिए.
एक घाटी की तरह.
सब कुछ समेट लेने वाले.
पानी से पारदर्शी.
क्या तुम में धीरज है?
इंतजार करने का,
वैसे जैसे पानी में मिटटी बैठ जाती है
और
पानी साफ़ लगता है.
क्या तुम तब तक रोक सकते हो
खुद को,
जब तक सब कुछ खुद से ठीक होने लगे.
साधक पूर्णता की तलाश में नहीं रहते,
कुछ चाहते नहीं, कुछ मांगते नहीं.
बस जीवन को अनुभव करते हैं
और
जो कुछ भी मिलता है,
उसका स्वागत करते हैं.
क्योंकि
उनको विलीन हो जाना है एक दिन
अपने मूल तत्त्व के साथ
जीवन में..

बोधत्व_ 14

जीवन_
देखो तो सब अदृश्य हो जायेगा.
सुनो तो कुछ न सुनाई देगा.
छू लोगे पर पकड़ न पाओगे.
ऊपर से ये चमकता नहीं,
नीचे अँधेरा भी नहीं.
साधारण सा, बिना नाम का.
शुन्य की दुनिया से लोट कर,
सब तरह के आकार को पा लेना.
एक नहीं बनी हुई आकृति जैसा.
नाजुक सी,
कभी न जनम लेने वाली.
इसको पा लो
तो
फिर कुछ शुरू करने की जरुरत नहीं.
इसके पीछे हो लो,
फिर कोई अंत नहीं.
तुम इस कभी जान नहीं पाओगे,
पर इस जैसे तो बन सकते हो.
खुद को बस अच्छे से महसूस करो.
तुम आये किधर से,
इतना समझ लो
यही बोधत्व है
और
ज़िंदगी पाने की तरकीब भी ..

जीवन _ 13

जान लो कि _
सफलता
विफलता से ज्यादा खतरनाक है.
उम्मीद
डर से ज्यादा खोखली है.
चाहे सीढ़ी पर चढ़ो या उतरो,
हिलते रहोगे.
अगर संतुलन चाहते हो तो _
दो पैरों पर खड़े रहो,
कभी नहीं गिरोगे.
उम्मीद और डर
दोनों ही
हमारे
हताश और थके मन से
पैदा होते हैं,
सिर्फ
हमें खुद से अलग करने के लिए.
अगर मन की न सुनोगे
तो ही जीवन का मधुर संगीत सुन पाओगे
खुद पर भरोसा रखो
और
जीवन से वैसे ही प्यार करो
जैसे वो तुमसे करता है
और
तुम्हे वो सब मिल जायेगा,
जो तुमने कभी माँगा नहीं
पर ..
चाहा जरूर था.

दिल _ 12

रंगीनियाँ
कई बार आँखों को अँधा कर देती है.
शोर
कई बार कानों को बहरा कर देता है.
स्वादिष्टता
कई बार स्वाद को ख़राब कर देती है.
आकांक्षाएँ,
बहुत सी हों तो दिल को रुखा कर देती है.
दुनिया में सुनो तुम सब की,
लेकिन करो सिर्फ अंदर की आवाज़ सुन कर.
तुम चीज़ों को बेखौफ आने जाने दो.
भीतर बाहर होने दो, जो हो रहा है.
आसमान की तरह खुलने दो,
अपने हृदय को.
तभी समेट पाओगे सारी क़ायनात.
और भर लोगे
अपनी झोली,
असीमित, अनंत ..

अस्तित्व _ 11

हम पहिये पर
अपना ध्यान लगाते हैं,
लेकिन ये बीच की धुरी है,
जो गाड़ी चलाती है.
हम घड़े की मिट्टी को
आकार देने में लगे रहते हैं
जबकि
उसका खालीपन ही महत्त्व रखता है.
घड़ा जितना खाली, उतना अच्छा.
हम मकान को,
बाहर से सुन्दर बनाने में लगे रहते हैं
लेकिन ये अंदर की जगह है
जहाँ  रहना होता है हमें.
हम अपने अस्तित्व की चिंता करते हैं
जबकि
हम एक परम सत्ता का
हिस्सा भर  हैं .
खुद से कुछ भी नहीं
और
जा मिलना है,
अपने वजूद के साथ
उसमें वापिस
जैसे नदी मिल जाती है
अथाह सागर में ..

दिव्यात्मा_ 16

अपने मन को विचारों से आज़ाद कर दो. तुम्हारा दिल बस शांत हो जाये. जब तुम्हारा शरीर तुम्हें कैद करने को कोशिश करे, तो ध्यान लगा कर गहरायी म...