पुराने साधक
बड़े ध्यानशील और संवेदनशील थे.
उनका ज्ञान अद्भुत और कल्पना से परे था.
उसे वर्णित करना संभव नहीं,
यदि संभव है तो
उनका एहसास करना.
वो इतने सावधान थे,
जैसे किसी बर्फीले तूफ़ान से गुजर रहे हों.
सतर्क इतने
जैसे कोई योद्धा
दुश्मन की भूमि में.
मेहमान जैसे विनम्र,
बर्फ से पिघल कर जैसे पानी.
लकड़ी के लट्ठे सा आकार लिए.
एक घाटी की तरह.
सब कुछ समेट लेने वाले.
पानी से पारदर्शी.
क्या तुम में धीरज है?
इंतजार करने का,
वैसे जैसे पानी में मिटटी बैठ जाती है
और
पानी साफ़ लगता है.
क्या तुम तब तक रोक सकते हो
खुद को,
जब तक सब कुछ खुद से ठीक होने लगे.
साधक पूर्णता की तलाश में नहीं रहते,
कुछ चाहते नहीं, कुछ मांगते नहीं.
बस जीवन को अनुभव करते हैं
और
जो कुछ भी मिलता है,
उसका स्वागत करते हैं.
क्योंकि
उनको विलीन हो जाना है एक दिन
अपने मूल तत्त्व के साथ
जीवन में..
Thursday, 2 July 2020
साधक_ 15
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