ज़िन्दगी तरफदारी नहीं करती.
ये पैदा करती है _
अच्छे को भी और बुरे को भी.
तुम भी तरफदारी न करो.
न ही रखो कोई भेद भाव.
दोनों का स्वागत करो,
साधु का भी, असाधु का भी
दोनों ज़िंदगी ने दिए हैं तुमको.
कर लो स्वीकार दोनों को.
ज़िन्दगी को एक बड़े गुब्बारे की तरह लो.
खाली, लेकिन अनंत समभावनाएँ लिए हुए.
हर तरफ शुन्य
जितना ज़िन्दगी को इस्तेमाल करो,
उतना विस्तार करती जाती है.
ये देती है अपना सब कुछ,
खुद को भी.
ज़िन्दगी को समझने की कोशिश में न पड़ो.
जितना इसके बारे में बात करोगे,
उतना काम जान पाओगे.
इस बस इसे बीच से पकड़ कर रखो
और
आनंद की पराकाष्ठा को छू लो.
यही शायद ज़िंदगी भी चाहती है तुमसे
और
कही न कही तुम भी ज़िंदगी से ..
Tuesday, 5 May 2020
गुब्बारा _ 5
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